Friday, 6 February 2015

रवि शंकर प्रसाद - दमदार भोजपुरिया

रवि शंकर प्रसाद (4)
60 वर्ष, राजनीती 




बिहार की माटी का नाम रौशन करने वालो में रवि शंकर प्रसाद का नाम अग्रणी है। एक वकील का रूप हो या राजनीतिक चिंतक का रूप में या राजनेता के रूप सभी किरदारों को रविशंकर प्रसाद ने बेहतरीन तरीके से निभाया है। देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के प्रवक्ता के तौर पर राष्ट्रवादी विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाने में रवि शंकर प्रसाद सफल रहे हैं। इसी का सु-परिणाम है कि आज वो देश के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं। 30 अगस्त, 1954 को बिहार के पटना में जन्में रवि शंकर प्रसाद ने अपने 60 वर्ष के जीवन-काल में देश की राजनीति को एक उच्चाई दी है।

आलोचना

2013 में रविशंकर प्रसाद ने भोजपुरी को आठवी अनुसूची में डलवाने का आश्वासन दिया था लेकिन जब से मंत्री बने हैं तब से इस बावत उनका एक भी बयान नहीं आया है। उनके इस रवैये से भोजपुरिया माटी  के लोग उनसे नाराज हैं।

मनोज तिवारी - दमदार भोजपुरिया

मनोज तिवारी (3)
43 वर्ष, राजनीती 




मनोज तिवारी के लिए 2014 राजनीतिक रूप से एक नया सवेरा लेकर आया। एक बार राजनीतिक रूप से गोरखपुर से मात खाने के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली ने उन्हें गले से लगा लिया और अपना सांसद बनाकर नरेन्द्र मोदी के कुनबे को मजबूति प्रदान की।  

बिहार के कैमुर जिला में स्थित भभुआ के अतरवलिया गाँव में 1 फरवरी 1971 को स्व. चन्द्रदेव तिवारी के घर जन्में मनोज तिवारी की प्रसिद्धि लोक-गायिकी से हुई। फिर भोजपुरी फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला ने उनको भोजपुरी फिल्मी दुनिया में एक नयी बुलंदी पर पहुंचाया। वर्तमान में अभिनेता से नेता बने मनोज तिवारी पर भोजपुरिया माटी के लोगन के आवाज संसद में उठाने की जिम्मेदारी है। हालांकि नेता बनने के बाद मनोज तिवारी अपने लोगों के बीच देखे जा रहे हैं, यह स्वभाव उन्हें आगे और उपलब्धि दिलायेगा।

आलोचना

मनोज तिवारी के निर्णयों को दूसरे लोग प्रभावित कर देते हैं। इस बात को लेकर मनोज तिवारी के शुभचिंतक परेशान रहते हैं। मनोज तिवारी यदि खुद का सुने तो वो ज्यादा बेहतर कर सकते हैं।

अनील कुमार सिन्हा - दमदार भोजपुरिया

अनील कुमार सिन्हा - (२)
58 वर्ष, अधिकारी

शांत स्वभाव


सीबीआई के डाइरेक्टर अनील कुमार सिन्हा की गिनती किसी के दबाव में न आने वाले अधिकारी के रूप में होती है। वे बेहद ईमानदार और दिन-रात काम करने वाले अधिकारी हैं। यही उनके सीबीआई  डाइरेक्टर पद पर पहुँचाने में सहायक सबित हुई, क्योंकि वे वैसे अधिकारी है जो घड़ी देखे बिना काम करते है, एक बार आॅफिस आने के बाद उनके घर जाने का कोई समय नहीं होता है। सिन्हा के बारे में यह धारणा हैं कि वे बेहद तटस्थ किस्म के अफसर हैं, वे किसी कैंप से नहीं जुड़ते। उनका जीवन का लक्ष्य सिर्फ काम करना हैं, संगीत में रूचि रखने वाले सिन्हा शांत स्वभाव के हैं। वे बिहार के कई जिलों में अहम पदों पर रहे।

बक्सर के मूल निवासी अनिल कुमार सिन्हा का जन्म 16 जनवरी 1956 को एक साहित्यकार परिवार में हुआ था, वे प्रख्यात साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय के नाती हैं। अनिल कुमार सिन्हा बिहार कैडर के 1979 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं। रंजीत सिन्हा के बाद अनिल कुमार सिन्हा दूसरे बिहारी अधिकारी हैं, जिन्हें 
सीबीआइ के निदेशक बनने का अवसर मिला है।

कामकाज व उपलब्ध्यिाः
अनील सिन्हा बिहार कैडर के 1979 बैच के अधिकारी अनिल कुमार सिन्हा सीबीआई में विशेष निदेशक थे। वे सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक, प्रशासन, विशेष शाखा और एपी, डीआईजी, आईजी और एडीजी के रूप में अन्य प्रभागों में अपने राज्य काडर में कई पदों पर कार्य किया हैं और अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में कार्य कर चुके है।

आलोचनाः
उनके आते ही अमीत शाह को प्रजापती मामले में क्लीन चीट मिल गया, जिसके लिए सीबीई की आलोचना हो रही है। पर, अभी अनील सिन्हा के सीबीआई डाइरेक्टर पद पर शुरूआत है!

राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह (दमदार भोजपुरिया) - (1)
६४ वर्ष, राजनीती 


अपने नाम के अनरूप राजनाथ सिंह ने देश की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। भाजपा को भारतीय राजनीति के मानचित्र पर मजबूती के साथ स्थापित करने में राजनाथ सिंह का महत्वपूर्ण योगदान है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का पद हो या भाजपा जैसे बड़े संगठन के अध्यक्ष पद सभी पदों के साथ राजनाथ सिंह ने न्याय किया है। वर्तमान में देश के गृहमंत्री के रूप में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं।

उत्तरप्रदेश के चंदौली जिले में 10 जुलाई 1951 को जन्मे राजनाथ सिंह ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी की डिग्री हासिल की। 1971 में मिर्जापुर में केबी पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कॉलेज में व्याख्याता नियुक्त हुए। वर्ष 1964 में 13 वर्ष की अवस्था में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। राजनाथ सिंह का भोजपुरिया प्रेम जगजाहिर है!

आलोचना

भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में लाने के की सबसे बड़ी जिम्मेदारी राजनाथ सिंह पर है। लेकिन वो अभी तक इसे आठवीं अनुसूची में शामिल कराने में सफल नहीं रहे हैं।

दमदार भोजपुरिया...

दमदार भोजपुरिया...



भारतीय ज्ञान-परंपरा ने पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है। भारतीयों की तर्क-शक्ति के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से भारतीय ज्ञान शक्ति व श्रम-शक्ति की बात होती है, उसी तरह भारतीय परिप्रेक्ष्य में बिहार की चर्चा होती है। बिहार की चर्चा होते ही सबसे पहले जिस भाषा-संस्कार-संस्कृति पर नज़र जाती है, वह है ‘भोजपुरी’। वैसे तो बिहार में मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका भी बोली जाती है और इन सभी भाषाओं व इसके बोलने वालों की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। लेकिन बिहार की पहचान को दर्शाने के लिए किसी एक भाषा का चुनाव करना हो तो वह निश्चित रूप से भोजपुरी ही है। बाकी भाषाओं व बोलियों की तुलना में भोजपुरी बोलने-समझने वालों की संख्या वैश्विक स्तर पर ज्यादा है। आज वैश्विक स्तर पर भोजपुरियों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। यह उपस्थिति यूं ही नहीं है, इसके पीछे एक बहुत बड़ी संघर्ष-कथा है। इतिहास के आइने में भोजपुरी भाषी भू-भाग को देखने पर मालूम चलता है कि यहां पर ज्ञान का अकूत भंडार रहा है लेकिन दूसरी तरफ भौतिकवादी युग के साथ तारतम्य बिठाने में भोजपुरी माटी के पूर्वज उतने सफल नहीं हो पाए जितने दूसरे क्षेत्रों के लोग हुए। इसका मुख्य कारण यह रहा कि भोजपुरिया लोग तीन-पांच की भाषा कम जानते हैं, साफ-सुथरा जीवन जीने में विश्वास रखते हैं। सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते हैं। आध्यात्म व धर्म के दायरे में ज्यादा मजबूती के साथ बंधे रहे हैं। पूर्वजों से मिले इस संस्कार ने कालांतर में आकर भोजपुरियों को इस कदर गढ़ा कि वो जहां भी गए अपनी ईमानदारी, मेहनत व कर्मठता की बदौलत अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। उनकी इस सफलता ने दूसरों के मन में जलन के भाव को जन्म दिया, जिसे गाहे-बगाहे मुंबई-असम में भोजपुरियों के खिलाफ घटी घटनाओं के रूप में हम देख सकते हैं।   दरअसल, भोजपुरी एक भाषा ही नहीं बल्कि एक संस्कृति है, संस्कार है। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में मुख्य रूप से लिखी-पढ़ी व बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा का विस्तार आज देश की चौहद्दी को पार कर चुका है। मॉरीशस, फिजी, यूगांडा, सूरीनाम सहित दुनिया के तमाम देशों में भोजपुरी प्रमुखता के साथ बोली जा रही है। दूसरे संदर्भ में बात करे तो दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां पर ‘का हाल बा’ की गुंज नहीं गुंजती। दरअसल, सच्चाई यह है कि भोजपुरीभाषियों का चरित्र इतना कर्मठ व कर्मशील रहा है कि वे प्रत्येक परिस्थिति में अपनी सार्थक उपस्थिति को दर्ज करा देते हैं।भारत की पहचान विविधता में एकता के रूप में रही है। यहां पर रंग-रूप-वेश-भूषा में तमाम तरह की विविधताएं पायी जाती हैं, लेकिन जब भारतीयता की बात आती है तो सब के सब एकजुट दिखाई देते हैं। ठीक यही फार्मुला भोजपुरीभाषियों के साथ भी लागू होता है। सिवान-छपरा-गोपालगंज की भोजपुरी, आरा-बलिया-बक्सर की भोजपुरी, जौनपुर-बनारस की भोजपुरी व गोरखपुर-गोंडा सहित तमाम भोजपुरी क्षेत्रों की भोजपुरी बोलने के अंदाज में विभिन्नता के बावजूद भोजपुरी के नाम पर सभी एकजुट हैं। भोजपुरी के प्रति सभी में एक सम्मान व श्रद्धा का भाव है। सच्चाई तो यह है कि भोजपुरी भूगोल की तासीर ही इतनी मानवीय है कि भोजपुरियों से जो एक बार मिल लेता है, वह आजीवन उसका बन के रह जाता है। 2001 से मैं खुद गांव से दूर हूं। पिछले 14 वर्ष के वनवास में देश के तमाम क्षेत्र के अच्छे-बुरे लोग मिले, लेकिन ऐसा कोई नहीं मिला जिससे मैं बात करने की स्थिति में नहीं हूं। कहने का मतलब यह है कि हम भोजपुरियों का व्यवहारिक पक्ष इतना मजबूत होता है कि किसी भी परिस्थिति में खुद को ढालने में सकारात्मकता के साथ हम सफल होते हैं। भोजपुरिया माटी के लालों ने अपनी मेहनत व ईमानदारी के बल पर दूर-प्रदेश में भी भोजपुरिया शान को बुलंदी प्रदान की है। भोजपुरियों के स्वभाव को रेखांकित करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. प्रमोद कुमार सिंह कहते हैं कि भोजपुरिया धान के बीज की तरह होते हैं। जिस प्रकार धान को उखाड़ कर दूसरे खेत में रोपा जाता है और उसकी उत्पादकता बढ़ जाती है ठीक उसी प्रकार जब भोजपुरिया अपना मूल स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर जाते हैं तो उनकी उत्पादन शक्ति बढ़ जाती है। दिल्ली-मुंबई-कोलकाता-चेन्नई में भोजपुरियों की दमदार उपस्थिति इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। देश की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा मुंबई के पास है। क्या बिहारी दिमाग को, खासतौर से भोजपुरिया दिमाग व श्रम शक्ति को मुंबई से बाहर कर के मुंबई की वर्तमान स्थिति की परिकल्पना की जा सकती है! शायद नहीं। मुंबई में इनकम टैक्स विभाग से लेकर छोटे-बड़े सभी कार्यों में भोजपुरी भाषी दमदार तरीके से श्रमदान करते हुए मिल जायेंगे। राजनीतिक रूप से भी आज मुंबई में भोजपुरिया इतने मजबूत हो चुके हैं कि वहां की राजनीतिक गणित को बनाने-बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं। भले ही ठाकरे जैसे कुछ लोग गिदर-भभकी दें, लेकिन यह भोजपुरियों का दमदार वजूद ही है कि वे खुटा गाड़कर मुंबई की सियासत में भी अपनी पकड़ बनाएं हुए हैं। मुंबई, सिनेमा के लिए जानी जाती है, भोजपुरियों ने अपनी प्रतिभा का बेहतरीन उदाहरण यहां भी दिया है। मनोज वाजपेयी से लेकर मनोज तिवारी तक तमाम कलाकारों ने भोजपुरिया मिट्टी को गरीमा प्रदान की है।इसी तरह दिल्ली में भी भोजपुरिया लोगों ने अपनी अलग पहचान बनाई है। सड़क से लेकर संसद तक भोजपुरियों की एक लंबी फेहरिस्त है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने सत्ता के गलियारों में जिस भोजपुरियां संस्कार की नींव डाली थी, उसकी गुंज आज भी राष्ट्रपति भवन में सुनाई देती है। दिल्ली की तरह ही कोलकाता में भी भोजपुरियां श्रम ने वहां के चटकल व्यवसाय को बुलंदी पर पहुंचाया था और आज भी वहां पर भोजपुरियों की दमदार उपस्थिति है। दक्षिण भारत में भी भोजपुरियों ने जाकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। यदि बंगलुरु की बात करें तो वहां के आईटी सेक्टर में भी ‘का हाल बा’ बोलने वालों की संख्या कम नहीं है। सभी बातों का सार यह है कि भोजपुरियों ने अपनी कार्य-कौशलता के बल पर देश में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर ज्ञान-विज्ञान-व्यवसाय, साहित्य, सिनेमा सहित प्रत्येक क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। उम्मीद करता हूं कि हम भोजपुरिया अपनी मानवीय तासीर को ऐसे ही आगे बढ़ाते रहेंगे और देश-दुनिया में भोजपुरी माटी का बुलंद पताका फहराते रहेंगे।

दमदार भोजपुरियां की खोज


भारत के विकास में भोजपुरियां श्रम शक्ति व ज्ञान शक्ति का अहम् योगदान रहा है। लेकिन भोजपुरिया माटी के सपूतों को एक मंच पर लाकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की कवायद कम ही हुई है। इसी संदर्भ में भोजपुरी पंचायत टीम ने यह फैसला किया कि हम 2015 के पहले अंक को उन भोजपुरियों को समर्पित करेंगे, जिन्होंने अपनी मेहनत-लगन व जुनून से अपने-अपने क्षेत्र में भोजपुरिया पताका को लहराया है। इसी संदर्भ में हमारी टीम पूरे देश-विदेश से दमदार भोजपुरियों की खोज में जुटी रही। इस दौरान सैकड़ों भोजपुरी के लालों के नाम हमारे पास आए। हमें इनमें से 50 दमदार भोजपुरियों की सूची जारी करनी थी। यह बहुत ही माथा-पच्ची का काम रहा। कोई भी प्रतिभागी किसी से कम नहीं था। इस स्थिति में हमने ऑनलाइन पापुलारिटी के ग्राफ को भी नाम फाइनल करने का एक मापदंड बनाया।

इस अंक में जिन भोजपुरियो का नाम नहीं आ पाया है, वे यह न समझें कि उनका योगदान भोजपुरी माटी के लिए कम है। अगले वर्ष इसी तरह एक और सूची हम जारी करेंगे। संभव है तब आपका नाम इस सूची में हो। बस आपको अपने क्षेत्र में बेहतर से और बेहतर कार्य करना है। हमारी टीम की नज़र आपके कार्यों पर लगातार बनी रहेगी। इस अंक में तमाम मित्रों ने अपने बहुमूल्य समय व सुझाव दिया है। उन सभी को ‘भोजपुरी पंचायत’ परिवार साधुवाद देता है।

आशुतोष कुमार सिंह
Bhojpuri Panchayat - Jan 2015

Wednesday, 4 February 2015

विश्व का स्वर्ग मॉरीशस

विश्व का स्वर्ग मॉरीशस

भारतीय अप्रवासियों के मारीशस आगमन के 80वीं वर्ष गाँठ के संदर्भ में मॉरीशस सरकार द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी महोत्सव में दुबारा मॉरीशस जाने का मौका मिला।सबसे ख़ुशी की बात यह थी कि मैं अपने पत्रकारिता गुरु मनोज श्रीवास्तव के साथ मॉरीशस सरकार द्वारा ऑफिसियल बुलावाया था। इस बार के अपने ९ दिनों के मॉरीशस प्रवास के दौरान मैं उन जगहों पर भी गया जहाँ पिछली बार नहीं जा पाया था और कई जगह तो दुबारा गया और भरपूर टाइम बिताया, और इससे मुझे मॉरीशस को पूरी तरह जानने और समझने का खूब मौका मिला।


१८० साल पहले २ नवंबर १८३४ को हमारे पूर्वज गिरिमिटिया बनकर मॉरीशस गएथे और आज अपनी मेहनत और लगन से मॉरीशस को दुनियाका का स्वर्ग बना डाले हैं।पर मॉरीशस में भारतियों का अप्रवासन बहुत ही कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समस्याओं से गुज़रा था।सरिता बुधु अपने किताब में लिखती हैं कि 'यह जीवित रहने, सफल  होने तथा विपरीत परिस्थितियों में रहकर एक स्वर्ग जैसे सुन्दर टापू के निर्माण करने किदुर्जेय अभिलाषा है, जो पुरे विश्व के लिए आज भी मिशाल के रूप में पेश किया जाताहै।’


जहा तक मॉरीशस में भोजपुरी भाषा का सवाल है तो यहाँ भोजपुरी इंडिया से अधिक समृद्ध लगती है और यहाँ विद्यालयी स्तर पर भोजपुरी की पढ़ाई होने लगी है। जो भी बच्चे भोजपुरी पढ़ते हैं या जो लोग-बाग भी हैं, वे सभी भोजपुरी के प्रति गंभीर दिखते हैं। भोजपुरी के प्रति उनकी गंभीरता का नजारा इस सम्मेलन में भी देखने को मिला। इसके साथ ही मैंने वहाँ के विद्यालयों में पढ़ाई जानेवाली कुछ किताबें भी लाया हूँ जिन्हें काफी व्यवस्थित और यथार्थपूर्ण रूप से तैयार किया गया है। भोजपुरी को इतने सरल और मधुर तरीके से पेश किया गया है कि बच्चे रूचि लेकर पढ़ सकें और आसानी से समझ सकें। वैसे मॉरीशस में दैनिक जीवन में लोगों  कासंपर्क तीन भाषाओं से होता है, फ्रेंच, क्रिओल औरभोजपुरी से। यहाँ फ्रेंच भी क्रिओल और भोजपुरी से थोड़ी प्रभावित दिखती है पर जहाँ तक भोजपुरी की बात है तो इसके बहुत कम शब्द यहाँ बोली जाने वाली फ्रेंच और क्रिओल में मिलते हैं। वैसे यहाँ मूल भोजपुरी भाषियों के साथ ही अन्य प्रांतों से आने वाले अप्रवासी भी पहले भोजपुरी ही बोलते थे, क्योंकियहाँ उस समय हर बस्तीया गावों में भोजपुरी-भाषियों का ही बहुमत था और वैसे भी भोजपुरी इतनी मधुर व सरल भाषा है कि सब इसे बोलना चाहते हैं। परंतु आज स्थिति थोड़ी बदल गई है और अब यहाँ के लोग-बाग वैसे ही भोजपुरी से थोड़ा दूर होते जा रहे हैं जैसे भारत में कुछ भोजपुरी भाषी, भोजपुरी अगुवा, नेता, संभ्रांत भोजपुरिया भोजपुरी से कन्नी काटते नजर आते हैं। अब मॉरीशस में भी लोग क्रिओल, फ्रेंच और अंग्रेजी पर ही ज्यादा ध्यान देने लगेहैं। जो बहुत ही सोचनीय है।

मुझे  मॉरीशस में कई बातें बहुत ही महत्वपूर्ण लगीं और बरबस ही मेरा ध्यान इधर चला गया। यह ध्यान देने वाली बात है कि मॉरीशस में ६० प्रतिशत से भी अधिक जन संख्या भारतीय मूलकी है। यह भी सत्य है कि भारत के सबसे गरीब लोग ही गिरिमिटिया मजदूर बनके मॉरीशस आये थे और आज वे अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा के बल पर इतने आगे निकल गए हैं कि ऐसा लगता ही नहीं के ये लोग गिरमिटिया मजदूर की संताने हैं। एक सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह भी है कि यहाँ ऊँच-नीच, जाति-पाति का भेदभाव नहीं है और ना ही आरक्षण ही है और न इसके लिए मारामारी व राजनीति। यहाँ पर शिक्षा व चिकित्सा सुविधाएँ निश्शुल्क हैं तथा साथ ही यहाँ हर बच्चे को शिक्षा लेना अनिवार्य है, अगर बच्चा शिक्षा ग्रहण नहीं करता तो उसके घर पर पुलिस आ जाती है और माता-पिता को फाइन भरना पड़ता है।बुजुर्गों को पेंशन की सुविधा है। मॉरिशस सरकार की इन गतिविधियों को देखकर लगा कि अपने ही लोग इस देश को किस तरक्की पर पहुँचा दिए हैं और यहाँ के अपनों के लिए कितना कुछ कर दिए हैं। वहीँ एक ओर हम लोग हैं जो आज भी ऊँच-नीच, जाति-पाँति में उलझे हुए हैं। जितना समय हम अपने विकास पर नहीं देते उससे अधिक हमारा समय समाज व देश में फैली कुरीतियाँ बर्बाद कर देती हैं। गौर से देखने पर हम अपने को मॉरीशस से भी ५०  साल पीछे पाते हैं और ऐसे में भी अगर आज यही मॉरीश ससरका की हमारी सरकार से उम्मीद करती है कि मोदी जी मॉरीशस को मेट्रो की सौगात देंगे... तो यह बहुत ही हास्यास्पद लगता है?
Left udeshwar Singh, Mauritius Presiden, Kuldeep Kumar and Mr Mukeshar Choonee at Mauritius


जो भी हो,मॉरीशस सरकार ने भारतीय अप्रवासियों के मारीशस आगमन के 180वीं वर्ष गाँठ के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी महोत्सव का सफल आयोजन कर इतिहास तो रच ही  दियाहै। भारत में केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा इस तरह के आयोजन हमने आज तक नहीं देखा है, जिसमें कोई सरकार इतने बड़े स्तर पर अपनी भाषा, संस्कृति एवं संस्कारों पर जोर देती दिखी हो। इसमें कोई दोराय नहीं कि मॉरीशस सरकार का यह अभूतपूर्व आयोजन भोजपुरी भाषा और  साहित्य के साथ ही संस्कृति के प्रसार-प्रचार  मेंमील का पत्थर साबित होगा और इससे हमारी भाषा, संस्कृति को एक नई दिशा व ऊँचाई मिलेगी। एक बात और हम भारतीय भोजपुरियों को मारिशसवासी भोजपुरियों से बिना शर्म किए सीखने की जरूरत है, उनके कार्यों, व्यवहारों को अपनाने की जरूरत है। अगर सँच कहूँ तो वे लोग हम लोगों से हर क्षेत्र में आगे हैं।

हम लोग शिष्टाचार भी भूलते जा रहे हैं। नाम व दाम पाने के लिए हम काफी हदतक गिर जाते हैं, न ही प्रोटोकॉल की परवाह करते और ना ही अपने बड़े-बुजुर्गों की। हम जहाँ भी जाते हैं, बस इसी अभिलाषा से जाते हैं कि हमें सम्मानित किया जाए। हम कभी मंच से बाहर रहकर काम करने में विश्वास नहीं करते अपितु मंच पर आसीन होने के लिए धक्का-मुक्की करते नजर आते हैं। अगर मंच पर पधारने हेतु संचालक हमारे नाम पुकारने में देरी करता है तो हम खुद ही बिना बुलाए मंच पर पहुँच जाते हैं, ये कैसी सभ्यता? यह कैसी शिष्टता?इतना ही नहीं हम हद तो तब कर देते हैं जब फोटो खिंचवाने के लिए धक्का-मुक्की कर देते हैं और उस सम्मानित व्यक्ति को भी पीछे कर देते हैं, जिसके साथ हमें फोटो खिंचवाना होता है। इस सब बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।
अंत में मैं इस सफल आयोजन के लिए करबद्ध होकर मॉरीशससरकार, डॉ. सरिता बुधु जी एवं श्री अरविन्द बिसेसर जी को धन्यवाद देता हूँ.... जयभोजपुरी! जय मारिशस!


वादों का हवाई किला

वादों का हवाई किला

देशवासियों के मन में एक ही सवाल- दिल्ली का सीएम कौन? इसका जवाबदेना मुश्किल है। सटोरियों की माने तो बीजेपी की जीत पक्की है। लेकिन सर्वे अलग-अलग संभावनाएं जता रहे हैं। कुल मिलाकर यह चुनाव भाजपा एवं आम आदमी पार्टी के बीच कड़ी टक्कर का संकेत दे रहा है। कांग्रेस तो इस लड़ाई में कहीं दूर-दूर तक भी नजर नहीं आ रही पर यह हो सकता है कि कहीं यह भाजवा व आप के गले की हड्डी न बन जाए और इन दोनों का खेल भी न बिगाड़ दे। क्योंकि अब समय फिर से करवट लेने लगा है और यह वही कांग्रेस है जो पिछले लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली की बागडोर संभालते हुए दिल्ली की तश्वीर बदलकर रख दी है। मेरे हिसाब से, अन्य प्रांतों की तुलना में कांग्रेस सरकार ने दिल्ली में सबसे ज्यादा काम किया था। अगर तत्कालीन केंद्र सरकार घोटाले और कॉमनवेल्थ गेम घोटाले नहीं हुए होते तो दिल्ली कांग्रेस फिर से दिल्ली के तख्त पर विराजमान होती और अभी इस चुनाव से जनता के साथ ही पार्टियों को द-चार नहीं होना पड़ता। पर तत्कालीन केंद्र सरकार के घोटाले, शीला सरकार के विकास को लील गए और शीला सरकार की सारी मेहनत इन घोटालों की बलि चढ़ गई तथा इसे के चलते एक नई पार्टी यानी आम आदमी पार्टी की उपज हुई।

केजरीवाल एण्ड कंपनी द्वारा जारी घोषणा पत्र मात्र एक छलावा लगता है। सपनों में भी इन्हें पूरा करना मुमकिन नहीं दिखता। दिल्ली का कुल बजट 40000 हजार करोड़ का है और ‘आप’ का बजट लगभग 12 लाख करोड़ का। अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि इतना पैसा कहाँ सेलाएगी‘आप’? किसी के भी यह समझ से परे हो सकता है कि केजरीवाल सरकार कैसे चलाएंगे। बिजली सस्ती कर देंगे, पानी फ्री कर देंगे, 15 लाख सीटीवी लगवाएंगे, भईइसके लिए पैसा चाहिए और वह पैसा आप कहाँ से लाओगे, जरा इस पर भी तो प्रकाश डाल दो? आज के समय में पार्टियों को वादे करना बहुत ही आसान लगता है पर जब पूरा करने की बात आती है तो तो तमाम कठिनाइयों को बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।यह घोषणा पत्र केजरीवाल एंड कंपनी के साथ ही दिल्ली जनता के लिए मात्र एक छलावा ही है। सब्सिडी की भी एक सीमा होती है और इसके लिए भी पूर्व तैयारी, धन आदि की जरूरत होती है, आखिर ये नेता, पार्टियाँ बिना सोचे-समझे ऐसे-ऐसे दावे क्यों कर देती हैं, जो कभी पूरा ही नहीं हो सकते। क्या इन नेताओं, पार्टियों के पास चुनाव के समय कोई जादू की छड़ी आ जाती है?केजरीवाल ने जो-जो वादे किए हैं, वो पांच साल तो क्या बीस सालों में भी हो जाए तो किसी चमत्कार से कम नहीं होगा! जब वादों का मौसम हो तो बीजेपी पीछे क्यों रहे। वह भी तो वादे-पर-वादे करती जा रही है। मोदी ने कहा है कि उनका एक सपना है कि2022 तक हर झुग्गीवाले के पास एक पक्का घर हो और इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दिल्लीवालों से वोट मांग रहे हैं। यह सपना कुछ हद तक संभव तो हैं पर करना मुश्किल है।

बीजेपी की सीएम उम्मीदवार किरण बेदी ने महिलाओं के सुरक्षा के लिए अपना ब्लू प्रिंट जारी किया है। किरण बेदी कह रही हैं कि महिलाओं को सुरक्षा देगी लेकिन यह तो दिल्ली की महिलाएं और लड़कियां ही जानती हैं कि बीजेपी सरकार आने के बाद छेड़छाड़ की घटनाएं कितनी कम हुईं हैं? इसी तरह करप्शन खत्म करने का वादा कर रही है बीजेपी, लेकिन एमसीडी में तो उसी का राज है - क्या एमसीडी में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है? क्या नक्शे बिना पैसा दिए पास होने लगे हैं? क्या पुलिसवालों ने, जो सीधे मोदी सरकार के अधीन हैं, रिश्वत लेना बंद कर दिए हैं? आप किसी भी व्यापारी, किसी भी ऑटोवाले, किसी भी रेहड़ी-पटरीवाले से पूछ लीजिए, वह बता देगा कि एनडीए सरकार आने के बाद भी हफ्तावसूली कैसे पहले की ही तरह चल रही है। मोदी सरकार ने केन्द्र में भले ही कुछ सुधार किया होपर दिल्ली प्रदेश में भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी पर रोक लगा पाने में विफल रही है।


एक तरफ केजरीवाल के साथ ऑटो वाले, पान वाले, गरीब हैं, निम्न-मध्यमवर्गीय लोग हैं, यूथ हैं तोवहीं बीजेपी के साथ मध्यमवर्गीय परिवार, उच्चवर्गीय एवं युवा वोटों के साथ व्यापारियों कातबका है। अगर इस बार कांग्रेस अपने पिछले विकास कार्यों के बल पर और हाल में दिल्ली में हुए उथल-पुथल को मुद्दा बनाते हुए अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करअपने वोटों में इजाफा कर पाती है और पिछले चुनाव के मद्देनजर4-5 प्रतिशत भी अधिक ला पाती है तो ‘आप’ को बड़ा नुकसान उठाना पड़ जाएगा और बीजेपी की बल्ले-बल्ले हो जाएगी क्योंकि कांग्रेस दिल्ली में जितनी मजबूत होगी, उतना ही फायदा दिल्ली बीजेपी को होगा, क्योंकि मोदी के पीएम बनने के बाद दिल्ली में भी काफी ओट बीजेपी के पक्ष में सुरक्षित दिख रहा है और इसमें सेंध लगा पाना अभी मुश्किल लग रहा है।अब 10 फरवरी को क्या रिजल्ट आता हैं यह देखना दिलस्पत होगा। यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी प्रतिष्ठा का चुनाव बन पड़ा है तभी तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद ही चुनाव की कमान संभाल रहे हैं और वरिष्ठ भाजपा नेता दिल्ली की गलियों में दिख रहे हैं। खैर अंत में यह भी कहना लाजिमी है कि भोजपुरिया समाज की इस चुनाव में भी प्रमुख भूमिका होगी और ये जिधर जाएंगे, दिल्ली के शासन को भी उधर ही जाना होगा।

Kuldeep Srivastava