Showing posts with label Bhojpuri Panchayat. Show all posts
Showing posts with label Bhojpuri Panchayat. Show all posts

Monday, 20 February 2017

प्रो करुणाशंकर उपाध्याय बेतुके और देशद्रोही बोल

भोजपुरी को मान्यता मिलने से आठवीं अनुसूची डम्पिंग ग्राउंड हो जाएगा : प्रो करुणाशंकर उपाध्याय



पढ़िए मुम्बई यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के बेतुके और देशद्रोही बोल:-
डॉ करुणाशंकर उपाध्याय विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय अपने वक्तव्य के दौरान हिन्दी की ताकत बताने की बजाय क्षेत्रीय बोलियाँ विशेषकर भोजपुरी के उपहास पर ही ज्यादे बोलते चले गए।
१. क्षेत्रीय बोलियाँ को आठवीं अनुसूची मे जगह देने से आठवीं अनुसूची बोलियों का डम्पिंग ग्राउंड हो जाएगा!
२. भोजपुरी सहित क्षेत्रीय बोलियों के दो कौड़ी के साहित्यकारों को पुरस्कार मिलने लगेंगे और हिन्दी के 12 लाख साहित्यकारों के साथ अन्याय होगा।
३. डॉ उपाध्याय के अनुसार अगर आज भोजपुरी के आठवीं अनुसूची मे आने से नहीं रोका गया तो कल चंबल के डाकू और कश्मीर के आतंकवादी भी अपने भाषा को आठवीं अनुसूची में डालने के लिए मांग करने लगेंगे। 
४. भाषा को लेकर एक देश मे भाषा युद्ध छिड़ जाएगा और देश मे हिन्दी के 38 बोलियों के नाम पर पृथक राज्य की मांग उठने लगेगी।
५. भोजपुरी भाषी जिस संख्या बल के होने की बात करते हैं उतनी संख्या बल उनकी है ही नहीं , उनके अनुसार भोजपुरी वाले अवधी बोली क्षेत्र को अभी अपने में मिला के अपना गलत संख्या बताते हैं।
६. उनके अनुसार भोजपुरी वाले तो अमिताभ बच्चन को भी भोजपुरी का बताते हैं जबकि वह मूल रूप से प्रतापगढ़ के हैं और अवधी है।
७. डॉ उपाध्याय का स्पष्ट मानना था की भोजपुरी को मान्यता मिलने से देश में अलगाववाद की भावना भड़केगी और जैसे देश में बंग भंग या पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था वैसी परिस्थितियों का निर्माण होगा।
८. डॉ उपाध्याय ने चीन कि कठोर और दमनकारी भाषा नीति कि वकालत करते हुए भारत सरकार से आग्रह किया की जैसे चीन अपने 58 बोलियों की जगह चाइना की राष्ट्र भाषा को अनिवार्य अनिवार्य बनाने के लिए कठोर एवं दमनकारी कानून लगाता है भारत सरकार को वैसे ही कठोर एवं दमनकारी कानून लाकर बोलियों को आठवीं अनुसूची में आने से रोकना चाहिए।
९. जिस दिन भोजपुरी को भाषा की मान्यता मिल जाएगी उस दिन आधिकारिक रूप से हिन्दी भाषियों की संख्या कम हो जाएगी और यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी की दावेदारी कम हो जाएगी।
१०. डॉ उपाध्याय का स्पष्ट मानना था की जिस दिन यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी को मान्यता मिल जाती है तो उस दिन हिन्दी को आग भी लगा दी जाए तो उनको मंजूर है उन्हे हर कीमत पर यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी की मान्यता चाहिए। 
११. अपने पूरे वक्तव्य के दौरान डॉ उपाध्याय क्षेत्रीय बोलियों के आठवीं अनुसूची मे शामिल होने के खिलाफ ही बोलते चले गए। अंत मे उन्होने कहा की या तो क्षेत्रीय बोलियों को आठवीं अनुसूची मे शामिल ही नहीं किया जाए और यदि किया ही जाना है तो हिन्दी की श्रेणी को अपग्रेड कर एक नई श्रेणी में डाला जाए।

********************************************************************************

भोजपुरी को मान्यता मिलने से आठवीं अनुसूची डम्पिंग ग्राउंड हो जाएगा ऐसे कथन हैं मुंबई विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो करुणाशंकर उपाध्याय के। इन दिनों भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग चल रही है। लेकिन हिंदी प्रेमी विद्वानों का मानना है कि हिंदी की ही इन बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लेने से हिंदी का नुकसान होगा। क्योंकि जनगणना के समय इन भाषाभाषियों की माृतभाषा भोजपुरी/मैथिली/राजस्थानी आदि लिखी जाएगी, न कि हिंदी। यह नुकसान हिंदी और देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना पड़ेगा। इस गंभीर विषय पर मुंबई प्रेसक्लब ने शुक्रवार दिनांक 17 जनवरी 2017 को मुंबई प्रेस क्लब मे साँय 3 बजे से एक रचनात्मक बहस का आयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता बॉम्बे उच्चन्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ. चंद्रशेखर धर्माधिकारी जी ने की। भोजपुरी का पक्ष रखने के लिए विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं महाराष्ट्र शासन के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सतीश त्रिपाठी मौजूद थे। भोजपुरी की तरफ से बड़ी मुखरता से उनका साथ दिया चार्टर्ड एकाउंटेंट पंकज जायसवाल ने। हिंदी का पक्ष रखा मुंबई विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर करुणाशंकर उपाध्याय ने ।

बहस की शुरुवात विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं महाराष्ट्र शासन के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सतीश त्रिपाठी ने करते हुए बहस के विषय पे टिप्पणी करते हुए कहा की वह हिन्दी बनाम बहस के विषय को लेकर थोड़ा भ्रम में हैं क्यूँ की कभी उन्होने सोचा ही नहीं था की हिन्दी का कभी वो विरोध करेंगे हिन्दी कभी भोजपुरी का विरोध करेगी। संविधान निर्माण के समय आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएँ थी अब 22 भाषाएँ है, मैथिली सहित 8 नई भाषाएँ आने से अगर हिन्दी कमजोर नहीं हुई तो भोजपुरी के जुडने से हिन्दी कैसे कमजोर हो जाएगी ये उनके समझ से बाहर है।

डॉ करुणाशंकर उपाध्याय विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय अपने वक्तव्य के दौरान हिन्दी की ताकत बताने की बजाय क्षेत्रीय बोलियाँ विशेषकर भोजपुरी के उपहास पर ही ज्यादे बोलते चले गए। डॉ उपाध्याय का स्पष्ट कहना था क्षेत्रीय बोलियाँ को आठवीं अनुसूची मे जगह देने से आठवीं अनुसूची बोलियों का डम्पिंग ग्राउंड हो जाएगा, भोजपुरी सहित क्षेत्रीय बोलियों के दो कौड़ी के साहित्यकारों को पुरस्कार मिलने लगेंगे और हिन्दी के 12 लाख साहित्यकारों के साथ अन्याय होगा। डॉ उपाध्याय के अनुसार अगर आज भोजपुरी के आठवीं अनुसूची मे आने से नहीं रोका गया तो कल चंबल के डाकू और कश्मीर के आतंकवादी भी अपने भाषा को आठवीं अनुसूची में डालने के लिए मांग करने लगेंगे। भाषा को लेकर एक देश मे भाषा युद्ध छिड़ जाएगा और देश मे हिन्दी के 38 बोलियों के नाम पर पृथक राज्य की मांग उठने लगेगी। डॉ उपाध्याय का यह भी कहना था की भोजपुरी भाषी जिस संख्या बल के होने की बात करते हैं उतनी संख्या बल उनकी है ही नहीं , उनके अनुसार भोजपुरी वाले अवधी बोली क्षेत्र को अभी अपने में मिला के अपना गलत संख्या बताते हैं। उनके अनुसार भोजपुरी वाले तो अमिताभ बच्चन को भी भोजपुरी का बताते हैं जबकि वह मूल रूप से प्रतापगढ़ के हैं और अवधी है। डॉ उपाध्याय का स्पष्ट मानना था की भोजपुरी को मान्यता मिलने से देश में अलगाववाद की भावना भड़केगी और जैसे देश में बंग भंग या पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था वैसी परिस्थितियों का निर्माण होगा। डॉ उपाध्याय ने चीन कि कठोर और दमनकारी भाषा नीति कि वकालत करते हुए भारत सरकार से आग्रह किया की जैसे चीन अपने 58 बोलियों की जगह चाइना की राष्ट्र भाषा को अनिवार्य अनिवार्य बनाने के लिए कठोर एवं दमनकारी कानून लगाता है भारत सरकार को वैसे ही कठोर एवं दमनकारी कानून लाकर बोलियों को आठवीं अनुसूची में आने से रोकना चाहिए। जिस दिन भोजपुरी को भाषा की मान्यता मिल जाएगी उस दिन आधिकारिक रूप से हिन्दी भाषियों की संख्या कम हो जाएगी और यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी की दावेदारी कम हो जाएगी। डॉ उपाध्याय का स्पष्ट मानना था की जिस दिन यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी को मान्यता मिल जाती है तो उस दिन हिन्दी को आग भी लगा दी जाए तो उनको मंजूर है उन्हे हर कीमत पर यूनाइटेड नेशन्स मे हिन्दी की मान्यता चाहिए। अपने पूरे वक्तव्य के दौरान डॉ उपाध्याय क्षेत्रीय बोलियों के आठवीं अनुसूची मे शामिल होने के खिलाफ ही बोलते चले गए। अंत मे उन्होने कहा की या तो क्षेत्रीय बोलियों को आठवीं अनुसूची मे शामिल ही नहीं किया जाए और यदि किया ही जाना है तो हिन्दी की श्रेणी को अपग्रेड कर एक नई श्रेणी में डाला जाए।

इस चर्चा में तृतीय वक्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट पंकज जायसवाल का वक्तव्य भोजपुरी और क्षेत्रीय बोलियों को लेकर काफी मुखर रहा और उनके निशाने पर डॉ उपाध्याय के बोलियों के उपहास वाले वक्तव्य रहे। जायसवाल के अनुसार डॉ उपाध्याय के
वक्तव्य और उनके तर्कों के स्तर को सुनने के बाद अब वो निश्चिंत हैं कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में जाने से कोई नहीं रोक सकता है। उन्होने डॉ उपाध्याय को आठवीं अनुसूची मे शामिल होने पर सूची को डम्पिंग ग्राउंड बोलने पर आड़े हाथो लिया और एक बूढ़ी होती माँ कि कहानी सुनाई कि एक बूढ़ी माँ अपने जवान होते बेटे के सामने आज अपने आसरे और हक़ के लिए खड़ी है और जवान बेटे को निर्णय लेना है। जायसवाल ने इस कहानी के माध्यम से बताया कि बोलियाँ ही हिन्दी कि जननी है और हिन्दी बोलियों कि संतति। भला जननी को संतति के यशस्वी और प्रगति करने से क्या आपत्ति होगी। अगर संतति को कष्ट होगा तो जननी को भी होगा। भोजपुरी तो हिन्दी का कभी अहित चाह ही नहीं सकती। भोजपुरी और हिन्दी
एक ही परिवार के हैं। आप कि अदालत मे अमर सिंह के वक्तव्य को उद्धृत करते हुए बताया कि यकीन मानिए जैसे पिता को पुत्र से हर्णे में बहुत मजा आता है, अगर आज भोजपुरी हार भी जाती है और हिन्दी जीत भी जाती है तो यकीन मानिए भोजपुरी को बहुत संतोष होगा। जायसवाल का मानना था कि यह तो वक़्त और दौर का तकाजा है कि हिन्दी बनाम क्भोजपुरी हो गया है,लेकिन उनको तो कभी अहसास ही नहीं हुआ कि दोनों अलग है। डॉ उपाध्याय को आड़े हाथों लेते हुए उन्होने कहा कि समस्या को समझिए,समस्या सरकारी व्यवस्था है जो कि जनगणना फॉर्म मे सिर्फ एक ही कॉलम रखती है, डॉ उपाध्याय को जनगणना फॉर्म के प्रारूप के खिलाफ लड़ना चाहिए ताकि वह बदले ना कि भोजपुरी और क्षेत्रीय बोलियों के खिलाफ। जायसवाल के अनुसार यदि जनगणना फॉर्म मे भाषा के कुछ कॉलम बढ़ा दिए जाएँ और आठवीं अनुसूची में बोलियों कि एक अप सूची बना दी जाए तो इस व्यर्थ के बहस और विवाद से बचा जा सकता है।



चौथे वक्ता के रूप मे अडवोकेट अनिल पांडे ने डॉ उपाध्याय के आंकड़ों कि सत्यता पे सवाल उठाए और उन पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने के आरोप लगाए। अडवोकेट अनिल पांडे के अनुसार डॉ उपाध्याय ने सभा मे सतही जानकारी पेश की, उनकी भाषा शैली बोलियों के प्रति उपहासात्मक रही और उनके नाम/पद/डिग्री के अनुरूप नहीं थी। अडवोकेट अनिल पांडे को उनसे स्तरहीन उपमा और सतही शब्दों के इस्तेमाल की अपेक्षा नहीं थी। उन्होने डॉ उपाध्याय के वक्तव्यों पे दुख व्यक्त करते हुए कहा की डॉ उपाध्याय अनावश्यक विवाद को हवा दे रहे हैं जिसे सोचा न जा सकता हो। 

कार्यक्रम के दौरान कुछ श्रोतावों ने डॉ उपाध्याय के द्वारा बताए गए आंकड़ों पे भी प्रश्न किया, तो किसी ने हिन्दी से रोजगार कैसे प्राप्त होगा ईसपे भी बल डाला। एक श्रोता ने अँग्रेजी और अंग्रेज़ियत और बच्चों के सिर्फ अँग्रेजी स्कूल में ही दाखिले को हिन्दी भाषा का संकट बताया।

अपने अध्यक्षीय सम्बोधन मे बंबई हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस चंद्रशेखरन धर्माधिकारी ने कहा कि आज हिन्दी को संकट हिन्दी भाषियों से ही है। जिस तरह से अँग्रेजी का विस्तार हो रहा है और हिन्दी का घटाव हो रहा है वो चिंताजनक है। असली खतरा हिन्दी को सबसे ज्यादा अँग्रेजी से है। हम क्यूँ नहीं अपने हिन्दी भाषा मे बोलियों के शब्दों को स्थान देते हैं, हम क्यूँ हिन्दी को कठिन करने पर तुले हुए हैं। अगर किसी वाक्य में कोई शब्द लेना है तो हमे अंगेरजी के बजाए बोलियों के शब्द लेने चाहिए तभी हिन्दी का विकास होगा। उन्होने अपने बारे में बताया कि वो अदालत के काम अँग्रेजी में करते थे, लेकिन अदालत के बाहर सब काम और बातचीत और सम्बोधन हिन्दी में ही करते थे।

कार्यक्रम के संयोजक और संचालक वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी और मुंबई प्रेस क्लब आयोजक रहा। गरमागरम चर्चा का निष्कर्ष रहा कि हिंदी की 38 बोलियों सहित देश की तमाम बोलियों के विकास के लिए सरकार कोई अलग व्यवस्था करे, ताकि इन बोलियों का टकराव हिंदी से न हो और ये भाषाएं भी प्राकृतिक रूप से फलें-फूलें।


Saturday, 14 January 2017

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची की ओर : मनोज तिवारी


नई दिल्‍ली: इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के साथ ही भोजपुरी साहित्य और आंदोलन के मुद्दे पर खूब जोरदार चर्चा हुई । सांसद और दिल्‍ली भाजपा के अध्‍यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि सरकार ने भोजपुरी को संवैधानिक मान्‍यता देने का मन पूरी तरह से बना लिया है और संसद के अगले सत्र में भोजपुरी की संवैधानिक मान्‍यता संबंधी बिल के संसद में पेश होने की पूरी उम्‍मीद है । इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पत्रिका 'भोजपुरी पंचायत' द्वारा अपने प्रकाशन के पांच वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित भोजपुरी साहित्‍यांदोलन कार्यक्रम में मॉरिशस के कला व संस्‍कृति मंत्री पृथ्‍वीराज सिंह रूपन, भारत में मारीशस के उच्‍चायुक्‍त श्री जगदीश्‍वर गोवर्धन, भोजपुरी सिनेस्‍टार, लोकगायक, सांसद एवं भाजपा के दिल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष मनोज तिवारी, भोजपुरी समाज दिल्‍ली के अध्‍यक्ष अजीत दुबे, सासाराम महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्‍यक्ष गुरूशरण सिंह, बिहारी कनेक्‍ट के अध्‍यक्ष उदेश्‍वर सिंह, पूर्वांचल एकता मंच के अध्‍यक्ष शिवजी सिंह की मौजूदगी में सम्‍पन्‍न इस कार्यक्रम में भोजपुरी पत्रकारिता, साहित्‍य, संस्‍कृति, कला व सिनेमा सहित भोजपुरी से जुड़े अनेक मुद्दों पर चर्चा हुई और भोजपुरी को जल्‍द से जल्‍द संवैधानिक मान्‍यता देने की मांग भी की गई ।  लोकगायक, सांसद एवं भाजपा के दिल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष मनोज तिवारी ने भोजपुरी की मिठास, विस्तार और समृद्धि पर बात करते हुए भोजपुरी पंचायत द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना करते रहे। उन्होंने बताया की अब वह समय दूर नहीं, जब भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर ली जाएगी। वे 'भोजपुरी-पंचायत' द्वारा किये जा रहे कार्यों से अभिभूत थे। उन्होंने मंच से बोलते हुए कहा कि कुलदीप भाई का कार्य निश्चय ही सराहनीय है। ये पूरी निष्ठा एवं मेहनत से पत्रिका को निकालते हैं। उन्होंने पत्रिका के हर कार्यक्रम में आने का वादा भी किया। 
भोजपुरी समाज दिल्‍ली के अध्‍यक्ष अजीत दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि यह गौरव की बात है कि मॉरीशस सरकार ने मॉरीशस में भोजपुरी को संवैधानिक मान्‍यता प्रदान कर रखी है और अब भारत में भी वर्तमान सरकार ने भोजपुरी को संवैधानिक मान्‍यता देने का मन बना लिया है । लेकिन हिंदी के कुछ विद्वान भोजपुरी की संवैधानिक मान्‍यता की राह में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि सच्‍चाई ये है कि भोजपुरी की संवैधानिक मान्‍यता से हिंदी का कोई नुकसान नहीं होने जा रहा है । उन्‍होंने कहा कि भोजपुरी का हिंदी से कोई विरोध नहीं है ।    
इस अवसर पर मॉरीशस के कला व संस्‍कृति मंत्री पृथ्‍वीराज सिंह रूपन तथा भारत में मारीशस के उच्‍चायुक्‍त श्री जगदीश्‍वर गोवर्धन ने भारत और मारीशस के प्रगाढ़ आपसी संबंधों तथा एक समान भाषा, संस्‍कृति, परम्‍परा और  रीति-रिवाजों को याद करते हुए कहा कि हमारी जड़ें भारत में हैं और हमारा सौभाग्‍य है कि हमें यहां पर इतना मान-सम्‍मान प्रदान किया जाता है । 

सासाराम महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्‍यक्ष गुरूशरण सिंह ने भोजपुरी के विकास और समृद्धि में पत्र-पत्रिकाओं के योगदानो की चर्चा करते हुए अनवरत रूप से 'भोजपुरी-पंचायत' का निकलना अनुकरणीय और सराहनीय है। बिहारी कनेक्‍ट के अध्‍यक्ष उदेश्‍वर सिंह ने विश्व स्तर पर भोजपुरी के कार्यक्रमों के आयोजनों की चर्चा करते हुए पत्रिका के योगदानों की सराहना करते हुए भोजपुरी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। पूर्वांचल एकता मंच के अध्‍यक्ष शिवजी सिंह ने बताया कि भोजपुरी केवल भाषा ही नहीं, एक संस्कृति है। विश्व भोजपुरी सम्मलेन के आयोजन द्वारा उनका यही प्रयास रहता है कि भाषा और संस्कृति की समृद्धि हो। इसमें साहित्यिक रूप से चर्चाओं और कवि-सम्मेलनों का आयोजन अनुकरणीय है। इसी क्रम में पत्रकार व 'भोजपुरी संसार' के संपादक मनोज श्रीवास्‍तव ने भी भोजपुरी से जुड़े विभिन्‍न मुद्दों पर अपने विचार रखते हुए भोजपुरी पंचायत की कल्पना और उसके अनवरत सफर पर विषय-परिवर्तन के रूप में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। सबने अपने-अपने पक्षों द्वारा भोजपुरी साहित्य की समृद्धि और इसके संवैधानिक सम्मान के लिए होते रहने वाले आंदोलनों पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया।
 कार्यक्रम में आये अतिथियों का स्वागत भोजपुरी पंचायत के संपादक कुलदीप श्रीवास्तव ने किया। जहाँ चर्चा सत्र का संचालन प्रो गुरुशरण सिंह ने किया वही बाकी सत्र का सञ्चालन व धन्यवाद ज्ञापन केशव मोहन पाण्डेय ने दिया। केशव मोहन पाण्डेय ने पत्रिका के साहित्यिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए बताया कि पत्रिका में भोजपुरी साहित्य की समृद्धि के लिए लगभग सभी विषयों पर साहित्यकारों के विचारों को प्रस्तुत किया जाता है। इसमें भाषा और संस्कृति के हर पक्ष पर विचार प्रस्तुत किया जाता है। पत्रिका में भोजपुरी साहित्यकारों को भरपूर मौका दिया जाता है और उनके बारे में जानकारी भी प्रस्तुत किया जाता है। 
उक्त कार्यक्रम में भोजपुरी साहित्य और आंदोलन से जुड़े विभूतियों को सम्मानित किया गया। भोजपुरी पंचायत द्वारा आयोजित इस 'साहित्यन्दोलन' कार्यक्रम में प्रो गुरुशरण सिंह, पाती पत्रिका के संपादक और श्रेष्ठ साहित्यकार डॉ अशोक द्विवेदी को, साहित्यकार डॉ जौहर शाफियाबादी को 'साहित्य-रत्न' से सम्मानित किया गया तो प्रसिद्ध व्यवसायी और समाजसेवी डॉ संजय सिन्हा को 'दमदार भोजपुरिया' का सम्मान दिया गया। 'भोजपुरी समाज' के अध्यक्ष अजीत दूबे को 'भोजपुरी-रत्न' से तथा पूर्वांचल एकता मंच के अध्यक्ष शिवजी सिंह को 'पूर्वांचल सम्मान' से सम्मानित किया गया। सम्मान के इसी क्रम में 'बिहारी कनेक्ट' के उदेश्वर सिंह, मधुवेंद्र राय और ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय, हरि नारायण राय और भोजपुरी संसार के संपादक मनोज श्रीवास्तव को 'भोजपुरी गौरव सम्मान' से सम्मानित किया गया। भारत में मॉरिशस के उच्चायुक्त श्री जगदीश गोवर्धन को 'भारत मॉरिशस मैत्री सम्मान' से सम्मानित किया गया। लोक कलाकार विपुल नायक को 'भिखारी ठाकुर सम्मान' तथा मॉरिशस के कला और संस्कृति मंत्री पृथ्वीराज सिंह रूपं को 'डॉ राजेंद्र प्रसाद सम्मान' से सम्मानित किया गया।

 इस अवसर पर भोजपुरी कवि देवकांत पाण्डेय 'देव', हेलो भोजपुरी के संपादक राजकुमार अनुरागी, अमरेंद्र सिंह, मुकेश सिंह, सुनील सिन्हा, रीता मिश्रा, नरेन्द्र कुमार सिंह - अध्यक्ष बिहारी संस्कृति मंच, लेखक आर के सिन्हा, राकेश परमार, सुजीत कुमार श्रीवास्तव आदि अनेक कवि, लेखक, वकील, अध्‍यापक, समाजसेवी, पत्रकार व अन्‍य बुद्धिजीवी उपस्थित थे ।

Wednesday, 25 March 2015

जिन्हें नाज है भोजपुरी पर, वो कहाँ हैं....



सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि जो भाषा रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं करा पाती, उस भाषा का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म होता जाता है। लेकिन यह सिद्धांत भोजपुरी के साथ ठीक-ठीक सामंजस्य नहीं बना पा रहा। सीधे तौर पर देखें तो अभी तक भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा भी नहीं मिला है पर इसके बावजूद यह भाषा अपनी उत्पत्ति क्षेत्र की सीमा लांघ कर दुनिया के लगभग 20 देशों में पंख पसार चुकी है। भाषा के विकास की भावना के साथ कुछ पेशेवर पहल भी देश में हुए हैं जो पर्याप्त न होने के बावजूद भी सकून देते हैं और संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के दावे को पुख्ता करते हैं। दूसरी ओर देखें तो, नेपाल से लेकर मॉरीशस और सूरीनाम में यह कुछ हद तक रोजगार की भाषा बनी है।


      एक हजार साल पुरानी भोजपुरी भाषा न केवल एक भाषा है बल्कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र का संस्कार और जीवन है। भोजपुरी में वह क्षमता है जो अन्य भाषाओं में कम देखने को मिलता है। यह हर परिस्थिति में अपनी स्थिति मजबूत कर लेती है और उस मुकाम पर पहुँच जाती है जहाँ इसे होना चाहिए था। अपनी ऐतिहासिकता के लिए विख्यात भोजपुरी एक तरफ बलिया से बेतिया तक फैली है, तो इसका उत्तरी-दक्षिणी फैलाव लौरिया नंदनगढ़ से आजमगढ़, देवरिया तक है। दूसरी ओर जहां इसकी कीर्ति पताका राम प्रसाद बिस्मिल, मंगल पांडेय, असफाकउल्लाह खां जैसे क्रांतिवीरों ने लहराया है तो, वहीं बाबू कुंवर सिंह ने इसी जमीं में जीत का जज्बा भरा है। आजादी के बाद भोजपुरी क्षेत्र से बनने वाले प्रथम राष्ट्रपति की बात हो या कर्मठ प्रधानमंत्री का, डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक सर्वश्रेष्ठ विकल्प पुरबिया माटी से ही निकले हैं। सचिदानंद सिन्हा ने अपना कौशल दिखलाया तो वहीं दूसरी ओर दुश्मनों के दांत खट्टे करने और सरहदों की रक्षा ही नहीं वरन विस्तार करने में बाबू जगजीवन राम का कोई सानी नहीं।

      हमारे सांसद अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा ले सकते हैं, क्योंकि हमारा भोजपुरिया प्रदेश विशेष रूप से सदा सत्ता का केंद्र रहा है और अपने सम्मान की रक्षा में हमेशा आगे रहा है। मौर्यों से पहले जरासंध और शिशुनाग जैसे शासकों को देख चुका यह क्षेत्र महान सिकंदर के आक्रमण को चंद्रगुप्त मौर्य के शौर्य से चुनौती देता है। कभी शिक्षा का महानतम केंद्र, तेजस्विता से ओत-प्रोत यह क्षेत्र कितने मनीषियों, शिक्षाविदों, राजनेताओं की महान कर्मस्थली बन विश्व का नेतृत्व किया, विश्व को मानवता का पाठ पढ़ाया और आज एकाएक यह अनपढ़ और अपने कर्तव्य के प्रति उदासिन कैसे हो गया? नेता, सांसद अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान की बात तो करते हैं पर संसद में असहाय क्यों दिखते हैं, यह संदेहास्पद बात है, इनकी कोई मजबूरी है या ये जानबूझ कर अपनी मातृभाषा को उपेक्षित रखना चाह रहे हैं।



      एक से बढ़कर एक पावरफुल भोजपुरिया सांसद, मंत्री, लोकसभा अध्यक्षा, प्रधानमंत्री एवं देश के सर्वोच्च पद महामहिम राष्ट्रपति हुए। पर, आजादी के 68 साल बाद भी भोजपुरी भाषा अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रही है। वह भी भारत में सबसे ज्यादा भोजपुरी बोलने वाले सपूतों को पैदा करने के बाद भी, भोजपुरी माटी के लाल देश मे ही नहीं विदेशों में भी अपनी हुनर, मेहनत और ताकत के बलबूते सर्वोच्च पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

      आज मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सुरीनाम, नीदरलैंड, त्रिनिदाद, टोबैगो जैसे देशों में भोजपुरी जनसमूह अपना परचम बड़े गर्व से फहरा रहा है। मॉरीशस के खेतों में गन्ने की खेती के लिए धोखा से ले जाए गए मजदूरों ने बसुधैव कुटुंबकम की भावना से ओत प्रोत हो कर उस मिट्टी को ही अपने खून-पसीने से सिंचना शुरू किया। बंजर जमीनें लहलहा उठीं और आज मॉरीशस विश्व का जीता-जागता स्वर्ग बन गया। यह भोजपुरी माटी की ताकत ही है कि देश के बाहर एक और भारत का निमार्ण हो गया। आखिर हमारे नेता अपने इतिहास से सीख क्यों नहीं लेते और वर्षो से लंबित भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की जोरदार पहल क्यों नहीं करते? आखिर कब तक ये सांसद, नेता, मंत्री केवल बातें बनाते रहेंगे और कोरा आश्वासन देते रहेंगे। यूपीए 1 एवं 2 के मंत्री और नेता भी केवल आश्वासन देने के सिवा कुछ नहीं किए। खांटी भोजपुरिया एवं सासाराम की सांसद, मीरा कुमारलोकसभा अध्यक्षा रहीं और कुशीनगर के सांसद आरपीएन सिंह गृहराज्य मंत्री रहे, फिर भी बिल तक पेश नहीं करा पाए लोकसभा में।

      भोजपुरी माटी में पैदा होकर अनेक भोजपुरिया सपूत अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण एवं पावरफुल बने। उन्हीं में से कवि केदार नाथ सिंह जी, आलोचक नामवर सिंह, मनेजर पाण्डेय जी और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ त्रिपाठी जी। इन चारों का मेरा नमन। इन लोगों ने अपने साहित्य, कविताओं और आलोचनाओं से देश-विदेश में भोजपुरी माटी का मान बढ़ाया है। पर, इन लोगों ने कभी भी अपनी मां की भाषा भोजपुरी की बात करना तो दूर कर्ज चुकाने की भी कोशिश नहीं की।

      हम ए महान विभूति लोगन से पुछत बानी की, ‘भोजपुरी के संवैधानिक दरजा मिले, एकरा खातिर कवनो फरज नइखे? विकिपीडिया पर भोजपुरी माटी के महान सपूत नामवर सिंह के हम प्रोफाइल पढ़त रहनी, पढ़ि के हमरा सरमिंदा महसूस भइल कि का कवनो भोजपुरिया खातिर एतना खराब समय आ गइल बा की ओकरा आपन पहिचान बतावत में सरम आवत बा? रउआँ सभे भी पढ़ लीं की का लिखल बा, ‘वे हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू, बाँग्ला, संस्कृत भाषा भी जानते हैं।’ नामवर सिंह के जनम 1 मई 1927 के बनारस (अब के चंदौली जिला में) के एगो गाँव जीयनपुर में भइल रहे। तऽ का माननीय नामवरजी के आपन माई भाखा भोजपुरी ना आवेला? का पैदा होते उहाँ का उर्दू भा बंगला बोले लगनीं? यह बहुत ही शर्म की बात है कि ऐसा व्यक्ति जिस पर हम भोजपुरियों को नाज है वह अपनी माटी की खूशबू और भाषा से ही परहेज कर गया, जिसमें वह पला-बढ़ा, जिसको बोलकर वह आज इस मुकाम पर पहुँचा।

मनेजर पाण्डेय जी एवं कविवर केदारनाथ सिंह जी भोजपुरी में कुछ ना लिख सकेनीतऽ भोजपुरी मान्यता के मांग भी ना कर सकेनी का? ओने साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ त्रिपाठी 24 भासा के लोगन के सम्मान देत समय एक्को बेर उनका आपन माई के भासा भोजपुरी के यादो ना आइल? इ सभ देख के दिल के बड़ा ठेस पहुँचे ला, पर का इ चारों विभूतियन के कुछु फर्क भी ना पड़े? अब ए से बड़हन सरम के बात का होई। 2013 में पटना में मोदी सरकार के पावरफुल मंत्री रविशंकर प्रसाद भी कहले रहनी की मोदी सरकार आवते भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता मिल जाई। पर मान्यता तऽ दूर के बात बा, अभी हाले में रविशंकर बाबु 22 भासा में किताबन के ‘डिजिटलाइजेशन’ के घोसना कइलन, पर भोजपुरी के तनको इयाद ना कइनें!


      हमरा उम्मीद ही ना पूरा विश्वास बा कि अगर इ नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मनेजर पाण्डेय जी, विश्वनाथ त्रिपाठी और सभ भोजपुरिया सांसद एक बार, एक साथ जोरदार ढंग से भोजपुरी के अष्ठम अनुसूची में सामिल कइले के मांग उठाई लोग तऽ कवनो सरकार के रोकल मुश्किल हो जाई आ मान्यता संबंधी बिल संसद में पास करहीं के पड़ी। जय भोजपुरी!


Wednesday, 18 March 2015

जर्मनी का दो सदस्यीय दल आज भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में



हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी का दो सदस्यीय दल आज भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में आया और भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की गतिविधियों, पाठ्यक्रम और उसके व्यापक सरोकारो से परिचय प्राप्त किया। इस दल में हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के साउथ एशिया केन्द्र के भारत विभाग के प्रतिनिधि श्री राडू काचूमारू तथा श्री सुबुर बख्त शामील थे। श्री काचू मारू ने भोजपुरी अध्ययन केन्द्र द्वारा विकसित नये ज्ञानानुशासन ‘जनपदीय अध्ययन’ की तारीफ की। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन में अस्मिताओं के निर्माण की आन्तरिक गति को समझने और उनके आपसी ताल-मेल और सह अस्तित्व की दृष्टि विकसित करने की क्षमता है, जो कि आज के विश्व की जरूरत है। श्री काचूमारू ने केन्द्र के संस्कृति और अस्मिता अध्ययन की तारीफ करते हुए कहा कि इसमें अकूत सम्भावनाएं हैं। देशज ज्ञान, देशज बुद्धिमत्ता, देशज कौशल को आधुनिक जीवन की बेहतरी में उपयोग करने की केन्द्र की धारणा बेहद सराहनीय है। उन्होंने केन्द्र के समन्वयक प्रो0 सदानन्द शाही से कहा कि केन्द्र की अवधारणाओं और सम्भावनाओं को मूर्त रूप देने के लिए हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय केन्द्र के साथ सहयोग करेगा। उन्होंने केन्द्र के समन्वयक प्रो0 शाही से इच्छा जताई कि भोजपुरी संस्कृति का अध्ययन करने के लिए जर्मन शोध छात्र केन्द्र में आयेंगे। श्री काचूमारू ने प्रो0 शाही से जनपदीय अध्ययन की अवधारणा, के बारे में हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में वक्तव्य देने के लिए आग्रह किया। श्री काचूमारू ने यह भी कहा कि भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की यह यात्रा एक सुदीर्घ और फलदायी सहयोग की शुरूआत है। भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के साथ शोध अध्ययन की ठोस परियोजनाएँ तथा साझेदारी की रूपरेखा तैयार करने के बाद हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय इस सिलसिले में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति से मुलाकात करेगा। केन्द्र के निदेशक, प्रो0 सदानन्द शाही ने इस दल का स्वागत करते हुए कहा कि छः सौ वर्ष पुराने और पश्चिम के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयांें में से एक हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों को अपने बीच पाकर मैं बेहद प्रसन्न हूँ। भोजपुरी और जनपदीय अध्ययन के नवस्थापित केन्द्र के लिए यह गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के साथ सहभागिता से केन्द्र को बल मिलेगा। इस अवसर पर प्रो0 शुभा राव, राजनीति विज्ञान, विभाग, प्रो0 एम नटराजन, जर्मन विभाग, डाॅ0 अंचल श्रीवास्तव, भौतिकी विभाग, डाॅ0 अवधेश दीक्षित, डाॅ0 अजीत राय, गोपेश, धीरज गुप्ता, शिखा सिंह, यश्वी मिश्रा, उषा, दिलीप कुमार सिंह, विनोद आदि लोग उपस्थित थे। 

Friday, 13 February 2015

मानसून-सत्र में भोजपुरी को मान्यताः मनोज तिवारी


एक साल बाद फिर से दिल्ली विधान सभा का चुनाव 7 फरवरी को होने जा रहा है, पिछले चुनाव में पिछली बार किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. इस बार केंद्र में सरकार बना चुकी भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों दिल्ली में सरकार बनाने का दावा कर रही हैं और दोनों में कांटे की टक्कर चल  रहा है. पिछले चुनाव में आप को पूर्वांचलियांे ने पूरा सपोर्ट किया था. इसी को देखते हुए भाजपा ने भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता-गायक और नार्थ ईस्ट दिल्ली के संसद मनोज तिवारी को पूर्वांचली वोटों का ध्रुर्वीकरण के लिए लगाया है और मनोज इस काम में लग भी गए  है. अभिनेता  से राजनेता बने मनोज बड़ी तेजी से राजनेता के रूप में लोकप्रिय हो रहे है. तभी तो झारखण्ड चुनाव में प्रधानमंत्री के बाद मनोज तिवारी की सबसे ज्यादा मांग थी, और मनोज ने सबसे ज्यादा 42 जनसभाएं की और झारखण्ड बनने के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार बनी है. अब दिल्ली की बारी है.  हाल ही में संसद मनोज तिवारी से भोजपुरी पंचायत ने बातचित किया। प्रतुस्त है बाचीत का प्रमुख अंशः

भोजपुरी कब तक आठवी अनुसूची में शामिल होइ? 
पांचवा सत्र में !

पाचवा सत्र यानी मानसून सत्र में?
हाँ

बिहार चुनाव के पहले?
हँसे, नहीं में ये शुरू की कह रहा हूँ कि 2015 में भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिल जाएगी। हमारी जिम्मेदारी है कि भोजपुरी को जल्द से जल्द आठवी अनुसूची में शामिल कर लिया जाए.  प्रधानमंत्री मोदी जी एवं गृहमंत्री जी बहुत गंभीर है.

अभिनेता से सांसद बने लोगो का ट्रैक रिकाॅर्ड अच्छा नहीं रहा है, वो काम नहीं करते, आपने अपने ७ महीने में क्या काम किया है?
मैंने अब तक 586 करोड़  का काम कराया रहा हूँ, इनमें से कई काम पूरा हो चुका हैं और कई काम बड़ी तेजी से हो रहे हैं। 277  करोड़ का पावर स्टेशन बन चुका है, हर्षविहार में जिसका उत्घाटन अरुण जेटली जी एवं पियूष गोयल जी किया। 100 से 125 करोड़  का सीवर, रोड, पार्क आदि का काम भी कम्पलीट हो चुका है.

इसके अलावे जो कोंग्रेस सरकार और आम आदमी के समय से रुका हुआ कई काम पड़ा था उसको फण्ड मुहैया कराकर तेजी से पूरा करवाया, जो 1500 करोड़ से ऊपर का है, उसमे 586 करोड़ का काम जोड़ देंगे तो ये 2000 हजार करोड़ का आँकड़ा पार कर जाएगा. जो ७ महीने में रिकार्ड काम करने की कहानी बयान कर रहा है.

दिल्ली चुनाव में आम आदमी से भाजपा को कड़ी ठक्कर मिल रही हैं, भाजपा की क्या रणनीति हैं?
ऐसा कुछ नहीं हैं, चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ‘आठ आदमी पार्टी’ बनकर रह जाएगी। क्योंकि
किरण बेदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनाने जा रही हैं।

Monday, 9 February 2015

स्वाती पाण्डेय - दमदार भोजपुरिया

स्वाती पाण्डेय - (50)
28 वर्ष, गायन - अंतरराष्ट्रीय

संगीत के साधिका



स्वस्ति पाण्डेय के भोजपुरी लोक संगीत और संस्कृति के विश्व स्तर पर प्रचार प्रसार में योगदानः ’गंगा जी के पनिया झलमल, नइया लागेला किनार’ - अमेरिका के प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट, भोर भिनसार के अरघ के बेरा, आ ओह पर गूँजत छठी माई के गीत। लहरन के आवाज के चीरत, हाड़ कपकपाने आला सीत के जीतत, यह आवाज हैे भोजपुरिया माटी के दमदार बेटी, स्वस्ति पाण्डेय का हैं। 

संगीत के साधिका के साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी, स्वस्ति पाण्डेय के जन्मस्थली आरा के महाराजा हाता है। तो इनका कर्मस्थली अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में अवस्थित सैन होजे नगर है। बाबूजी, डाॅ. कपिल देव पाण्डेय (हिंदी के प्राध्यापक, जैन काॅलेज आरा) के स्नेहिल छाया असामयिक निधन के कारण बचपन में ही उठ गया था। इससे उनकी किशोरावस्था बड़ी विषम परिस्थिति में बिता था। माताजी (श्रीमती शुभा पाण्डेय) जीवन के उस विशम समय को बड़ी चुनौती के साथ डट के मुकाबला की और स्वस्ति के पठन पाठन पर किसी तरह का कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ने दिया। विद्याध्ययन के साथ-साथ खेलकूद, एनसीसी आ विशेषकर संगीत, में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए निरंतर प्रेरित करती रही।

महेन्द्र प्रताप सिंह - दमदार भोजपुरिया

महेन्द्र प्रताप सिंह - (49)
62 वर्ष, रंगमंच

रंगकर्मी



रंगश्री के संस्थापक महेन्द्र प्रताप सिंह विश्व भर में अपने नाटक के मंचन के लिए जाने जाते हैं। रंगश्री भोजपुरी रंगमंच को समर्पित एक नाट्य संगठन हैं जो भोजपुरी नाटकों को सालो भर विभिन्न जगहों पर मंचन करता रहता हैं, जिससे समाज में जागरूता आए। रंगश्री समाज के बुराइयांे पर कटाक्ष करती हुई नाटकों का मंचन करता है। महेन्द्र प्रताप भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के विरासत को जींदा रखने के लिए कठिन परिश्रम करते हुए नजर आते हैं। 31 जुलाई 1952 को भोजपुर जिले के चंदी गांव में महेन्द्र प्रताप सिंह का जन्म हुआ था। 

वे अब तक दो भोजपुरी नाटक ‘कटोच’ और ‘बिरजू के बियाह’ लिख चुके है। ‘बिरजू के बियाह’ दहेज प्रथा पर चोट करती हुई नाटक हैं, जो काफी लोकप्रिय नाटक हैं।

अंजना सिंह - दमदार भोजपुरिया

अंजना सिंह - (48)
24 वर्ष, फिल्म


हाॅट केक


भोजपुरी की हाॅट केक कही जाने वाली अभिनेत्री अंजना सिंह की बादशाहत लगातार तीसरे साल भी जारी है। पिछले दो साल में सर्वाधिक फिल्मो करने वाली अंजना  की  इस साल भी बाॅक्स आॅफिस पर सर्वाधिक फिल्मे रिलीज हुई। भोजपुरिया बाॅक्स ऑफिस पर साल 2014 में दस्तक देने वाली  पहली फिल्म करे ला कमाल धरती के लाल और आखिरी फिल्म लाल दुपट्टे वाली, इन दोनों ही फिल्मो में अंजना मुख्य भूमिका में थी।  इस दोनों ही फिल्मो के  बीच अंजना की सभी बड़े कलाकारों के साथ दस और फिल्मे रिलीज हुई। पिछले तीन सालों में अंजना सिंह ने रिकार्ड कुल 36 फिल्में की हैं, और फिल्म सेक्शन में अंजना के लिए ही सबसे ज्यादा वोट आए।

7 अगस्त 1990 को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में अंजना का जन्म हुआ। चार भाई-बहनों में अंजना दूसरे नंबर की थी। बहराइच से स्कुली शिक्षा ग्रहण करने के बाद अंजना लखनऊ आ गई और उसी साल वो मिस लखनऊ प्रतियोगिता में दुसरे नंबर पर रहीं। फिर क्या था वो मुंबई आ गई और भोजपुरी फिल्मों की सबसे डिमांडिग अभिनेत्री बन गई।

आलोचनाः
ज्यादा अंगप्रर्दशन करती हैं।

संजय कु. तिवारी - दमदार भोजपुरिया

संजय कु. तिवारी - (47)
46 वर्ष, उद्योगपति, अतरराष्ट्रीय

दिलदार



भारत के बारह जाकर जाॅब करना और फिर अपनी बिजनेश करना, यह किसी भारतीय और भोजपुरियों के लिए किसी करिश्में से कम नहीं हैं। पेशे से इंजीनियर संजय कुमार तिवारी दो दशक पहले गल्फ में जाॅब करने गये संजय आज एक बड़ी कंपनी के मालिक है। जब उन्होंने जाॅब छोड़ी तो वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में जेनरल 
मनेजर’ के पद पर थे। उनकी कंपनी ‘नेशनल स्टोन  ’में लगभग 200 लोग काम करते हैं उनसे से अधिकतर बिहारी ही है। संजय सिवान जिले के तितरा गांव के हैं, अपनी पढ़ाई उन्होंने रांची से की हैं।

मो. इरसाद - दमदार भोजपुरिया

मो. इरसाद -  (46)
39 वर्ष, अंतरराष्ट्रीय

भोजपुरी के स्टार प्रचारक


मोहम्मद इरसाद सिदिकी, समाजिक, मसकट, ओमान इरसाद भाई गल्फ देशों में और खासकर मसकट में भोजपुरी भाषा और संस्कृति के विकास में वषों से लगे है और काफी हद तक गल्फ में भोजपुरी स्थापित में सफल भी रहे है।

कुशीनगर के लक्षमीपुर गाँव निवासी मो. इरसाद विश्व में भोजपुरी के सेवक रूप में  काफी लोकप्रिय है, उन्होंने भोजपुरी माँ की सेवा के साथ ही अपने इराके के बहुत सारे गायको को अंतरराष्ट्रीय मंच मुहैया कराया है। देश के लगभग सभी नामचिन भोजपुरी गायकों एवं समाजिक कार्यकत्ताओं को मसकट में भोजपुरी मंच पर उनका सम्मान बढ़ाया है।

इरसार एक क्रिकेट खिड़ाली के साथ एक क्रिकेट कोच की भूमिका मसकट के टीम के लिए बखूबी निभा रहे है। वे पेश्ेावर क्रिकेट कोच है जो आॅस्टेलिया और पाकिस्तान से लेवल 2 की कोचिंग की कोर्स किए है। इसाद ने दश के कई हजार लोगों को रोजगार दिलाने में मदद की है और करते रहते है, हर साल हजारों भोजपुरियों को वे रोजगार गल्फ देश में दिलाते है। मो. इरसाद के समाजिक कार्य को देखते हुए उनको कई सम्मान से सम्मानित किया गया है।

आलेाचनाः 
अपनी भावनाओं को छुपा नहीं पात हैं, जिसके चलते लोगो को लगता हैं कि वो बोलते ज्यादा हैं।

मनोज श्रीवास्तव - दमदार भोजपुरिया

मनोज श्रीवास्तव - (37)
52 वर्ष, पत्रकार

व्यंगकार


वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभ लेखक मनोज श्रीवास्तव पिछले कई वर्षों से भोजपुरी संसार पत्रिका का समन्वय संपादन का कार्य कर रहे हैं। भोजपुरी साहित्य व भोजपुरी आंदोलन को बारिक नजरों से अगर कोई परखता रहा है तो वह नाम है मनोज श्रीवास्तव। मनोज श्रीवास्तव की पहचान भोजपुरी साहित्य-पत्रकारिता में एक व्यंग्यकार के रूप में है। मूल रूप से सिवान जिला के लहुरी कोड़िया के रहने वाले मनोज श्रीवास्तव वर्तमान में लखनऊ को अपना कर्म भूमि बनाए हुए हैं।

रवीन्द्र श्रीवास्तव - दमदार भोजपुरिया

रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी  - (35)

72 वर्ष, पत्रकार

प्रखर वक्ता


भोजपुरी पत्रकारिता को बुलंदी दिलाने में रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी का भी अहम योगदान है। 12 मई 1942 को गोरखपुर में जन्में रवीन्द्र श्रीवास्तव ने आकाशवाणी के माध्यम से भोजपुरी साहित्य का प्रचार किया है। उनका स्तंभ ‘बेगुंची चलल फुंकावे नाल’भी बहुत प्रसिद्ध रहा है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से प्राप्त कर चुके रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी भोजपुरी पत्रकारिता के आधार स्तंभ पत्रकारों में शुमार हैं.

प्रो. गुरुशरण सिंह - दमदार भोजपुरिया

प्रो. गुरुशरण सिंह - (33)
56 वर्ष, शिक्षा

दमदार वक्ता


भोजपुरी भाषा-साहित्य को अकादमिक रूप देने में प्रो. गुरूशरण सिंह का अहम योगदान रहा है। एस.पी.जैन महाविद्यालय, सासाराम में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्य कर रहे प्रो. गुरूशरण सिंह के मार्गदर्शन में आधे दर्जन से ज्यादा छात्र भोजपुरी-साहित्य में शोध कर रहे हैं अथवा कर चुके हैं। 

इग्नू के लिए भोजपुरी पाठ्क्रम में सक्रिय भूमिका निभाने वाले प्रो. गुरूशरण सिंह अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के महामंत्री हैं। 

देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रो. गुरूचरण जी द्वारा रचित भोजपुरी साहित्य का प्रकाशन होता रहा है। भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका के समन्वय संपादक रूप में प्रो. सिंह ने भोजपुरी को एक समृद्ध करने का कार्य उन्होंने किया। 

आलोचनाः
भोजपुरी को अकादमिक रूप से स्थापित करने में सहयोगी रहे गुरूशरण जी को लेकर आलोचकों का कहना है कि उन्हें किताब लेखन पर और ध्यान देना चाहिए।

प्रेम शुक्ल - दमदार भोजपुरिया

प्रेम शुक्ल - (32)
47 वर्ष, पत्रकार

असरदार व्यक्तित्व



मुंबई से प्रकाशित दोपहर का सामना दैनिक पत्र के संपादक की भूमिका निभा रहे प्रेम शुक्ल मुंबई में भोजपुरियों के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। माॅरीशस के संसद को संबोधित करने का अवसर प्राप्त करने वाले वो पहले भारतीय भोजपरिया हैं। विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रेम शुक्ल मुंबई में विश्व भोजपुरी सम्मेलन दो बार आयोजित करा चुके हैं। इतना ही नहीं मराठी भोजपुरी समरसता के लिए “लाई चना महोत्सव” का आयोजन भी वो कराते हैं।

जय कान्त सिंह - दमदार भोजपुरिया

जय कान्त सिंह - (31)
45 वर्ष, शिक्षा

शिक्षाविद्



जयकान्त सिंह जय पहले कमीशन द्वारा नियुक्त भोजपुरी के प्रोफेसर है। उन्होंने भोजपुरी भाषा-साहित्य पर कई शोध एवं पुस्तकें लिखी हैं।

जय कान्त सिंह जय का जन्म 1 नवम्बर 1969 को बिहार के छपरा जिले में हुआ था। उन्होंने लगभग आधे दर्जन किताबे लिखी है। 

Sunday, 8 February 2015

प्रो. शत्रुध्न कुमार - दमदार भोजपुरिया

प्रो. शत्रुध्न कुमार - (29)
58 वर्ष, शिक्षा

शिक्षाविद्



प्रो. शत्रुध्न कुमार इग्नू में भोजपुरी भाषा की शुरूआत कराने में अहम भूमिका निभाने के लिए जाने जाते है या यूं कहे की इग्नु में भोजपुरी की पढ़ाई होने के पिछे शत्रुध्न कुमार का ही सोच है। वो इग्नू में पिछले 25 सालो से हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत है। लगातार वे तीन वर्षो तक इग्नू के सर्वोच्च समिति बोर्ड आॅफ मेनेजमेंट के सदस्य रहे। इग्नू के भोजपुरी भाशा पाठ्यक्रम के सूत्रधार एवं संयोजक की भूमिका बखूबी निभा रहे है।

प्रो. शत्रुध्न कुमार का जन्म 6 जून 1956 को मेहीजाम, जिला दुमका बिहार में हुआ था। इन्होंने एम.ए., पीएचडी., बांग्ला भाशा तथा जपानी भाषा में सर्टिफिकेट कोर्स, चित्रकला में विशेष योग्यता तथा संस्कृत से स्नातक तक पढ़ाई की है। उनका हिन्दी, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंग्रेजी, बांग्ला, जपानी , उर्दू भाषा पर अच्छी दक्षता है।

1987 में इग्नू के स्नातक स्तर के लिए कुल चैंतीस पाठ सामग्री का लेखन। हिन्दी पाठ्यक्रम से सम्बन्धित आॅडियो-विडियो का निर्माण, असमी-ओड़िया-बांग्ला भाषा के आधार पाठ्यक्रमों का संयोजन, स्नातकोत्तर के ’भारतीय साहित्य की भूमिका’ पाठ्यक्रम निर्माण में सक्रिय। इग्नू में दलित साहित्य पर पाठ्यक्रम निर्माण में सफल भूमिका।

अशोक चैबे - दमदार भोजपुरिया

अशोक चैबे - (2४)
43 वर्ष, सामाजिक

उर्जावान



ब्रज क्षेत्र आगरा में भोजपुरी की अलख जगाने वाले सीवान बिहार के खांटी भोजपुरिया अशोक चैबे अपने काॅलेज के दिनों से ही भोजपुरी माई के सेवा में कार्यरत हैं। सीवान डीएवी से इंटर करने के बाद ही आगरा जा बसे अशोक अपने कुछ भोजपुरी भाईयों के साथ मिलकर 1989 में पूर्वांचल सांस्कृतिक सेवा समिति नामक एक संस्था बनाई। तब उनके संस्था में मुठी भर लोग ही थे आज 80 हजार लोग इस संस्था में से जुड़े हैं।

आलोचनाः 
बेबाक तरीके से किसी की परवाह किए बिना अपनी बात को मजबूती से रखना।

अभय सिन्हा - दमदार भोजपुरिया

अभय सिन्हा -  (28)
46 वर्ष, फिल्म

भोजपुरी फिल्मों के संरक्षक



अभय सिन्हा एवं उनकी कंपनी यशी फिल्म अब तक 30 भोजपुरी फिल्मों का निर्माण कर चुकी है। अभय सिन्हा को सबसे बड़ी बजट एवं क्वालिटी फिल्म बनाने के लिए जाना जाता है। 

बिहार के आरा जिले में जन्में अभय सिन्हा ने भोजपुरी फिल्म उद्योग परिवारिक एवं तकनीकी रूप से उत्कृष्ट बनाने का श्रेय है। नहीं तो अधिकतर फिल्में बहुत ही निम्न दर्जे के फिल्में बनने लगी है जिससे भोजपुरी फिल्मों का मार्केट मंदा चल रहा है।

आलोचनाः
अब कम फिल्में बनाने लगे हैं!

जय प्रकाश सिंह - दमदार भोजपुरिया

जय प्रकाश सिंह -  (27)
42 वर्ष, अधिकारी

जबाज अधिकारी



जबाज आईपीएस अधिकारी जय प्रकाश सिंह अपने काम से एक काबिलियत अधिकारी एवं ईमानदार छवि के मालिक हैं। फिलहाल वह जनरल वीके सिंह  के पीएस के पद पर कार्यरत हैं। बिहार के छपरा जिले के टेघरा गाँव में जन्में जय प्रकाश सिंह शुरूआत से ही मेधावी छात्र रहे है, 1988 से 1994 तक इंडियन आर्मी में पंजाब एवं जम्मू एण्ड कश्मीर में उनके द्वारा सराहनीय काम के चलते के लिए उनको मेडल मिला।

1994 से 1997 और यूपी सरकार के 1997 से 2000 तक अपनी सेवाएं प्रदान कीए उनके बाद 2000 में वे हिमाचल प्रदेश कैडर में आए फिलहाल वे
डीआईजी रैंक के अधिकारी हैं।

प्रो. सदानन्द शाही- दमदार भोजपुरिया

प्रो. सदानन्द शाही-  (26)
56 वर्ष, शिक्षाविद्

बौद्धिक व्यक्तित्व



प्रो. सदानन्द शाही का जन्म कुशीनगर जनपद के छोटे से गांव सिगहा में 7 अगस्त 1958 को हुआ। प्रोफेसर सदानन्द शाही काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के समन्वयक हैं। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की स्थापना से लेकर उसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में प्रो. शाही ने अथक श्रम किया है। 

विश्व विद्यालय के भीतर और बाहर के अनेक मंचों पर उन्होंने यह बात मजबूती से रखी कि भोजपुरी भाषा का विकास भोजपुरी समाज के विकास से जुडा है। उन्होंने यह भी  स्थापित किया कि भोजपुरी का अर्थ  केवल लोक साहित्य नही, बल्कि विशाल भोजपुरी समाज और उसमें मौजूद देशज ज्ञान है। प्रोफेसर शाही ने भोजपुरी के बौद्धिक एवं वैचारिक पहलू को स्थापित करने के लिए ‘भोजपुरी जनपद’ जैसी पत्रिका निकाली। जन भोजपुरी मंच की स्थापना करके प्रोफेसर शाही ने भोजपुरी आन्दोलन को सतही भावुकता से निकालने का यत्न किया।

5 अगस्त 2014 को उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री से मिलकर प्रो शाही उन्हें यह  समझाने में सफल रहे कि भोजपुरी की जरूरत केवल भावनात्मक वजहों से नहीं बल्कि एक वृहत्तर समाज की समझ और कल्पनाशीलता से जुडा है। प्रोफेसर शाही ने उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष अनेक तर्क और तथ्य देकर यह स्थापित किया कि  भोजपुरी बोली से विकसित होकर भाषा का रूप ले चुकी है।परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश सरकार ने 29 अगस्त 2014 को भोजपुरी अकादमी स्थापित करने की घोषणा की। 

प्रोफेसर शाही ने इसी वर्ष भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लेकर गृहमंत्री से मिल और इसके लिए ठोस तर्क मुहैय्या कराया।सम्प्रति प्रोफेसर शाही भोजपुरी डायस्पोरा चेयर तथा भोजपुरी विश्व विद्यालय बनवाने के लिए यत्न शील हैं। इसके लिए मारीशस तथा भारत सरकार से लगातार संवाद हैं।